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2017-03-03 04:54:15

अगले चरणों में मायावती मुख्तार अंसारी के दम पर लड़ेंगीं

 उत्तर प्रदेश चुनाव में जब किसी भी पार्टी ने अपना प्रचार नहीं शुरू किया था, उस समय मायावती ने लखनऊ की अपनी रैली में साफ़ कर दिया था कि वे अपना चुनाव दलित और मुस्लिमों के गठजोड़ पर लड़ेंगीं. ऐसा नहीं है उनकी इस बड़ी चुनावी रणनीति के बारे में किसी को अंदेशा नहीं था, लेकिन चुनावी रैली में मायावती ने इस पर अपनी मुहर लगा दी थी.

इसी कड़ी में सपा से लगभग लगभग तिरस्कृत करके निकाले गए मऊ के क़द्दावर अंसारी बंधुओं के क़ौमी एकता दल का हाथ थामते हुए मायावती ने साफ़ कर दिया कि जैसे ही विधानसभा चुनाव पूर्वांचल में घुसेंगे, वैसे ही मुस्लिम वोटों के किस ताकत को केंद्र में लाया जाएगा. सपा से क़ौमी एकता दल की टूट ने ताक़त को तिरस्कार की सहानुभूति भी दे दी है, और शायद कहीं न कहीं मायावती को थोड़ी बढ़त भी.

आगामी 4 और 8 फरवरी को जिन विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें मऊ और गाजीपुर दो ऐसे क्षेत्र हैं, जो मायावाती के इस गठजोड़ की परीक्षा लेंगे. मऊ में चार विधानसभा सीटें हैं तो गाजीपुर में 7. मऊ में मायावती ने 28 फरवरी को रैली की और कहा कि यदि आप मुख्तार अंसारी को भारी वोटों से जिताते हैं तो उनकी बाहुबली की छवि धीरे-धीरे गायब हो जाएगी. ऐसे मायावती ने एक तो यह दिखाना चाहा कि वे अपराध पर अंकुश लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और दूसरा ये कि मुख्तार अंसारी का गैंग्स्टर या बाहुबली होना किसी भी रूप में अन्य पार्टियों के लिए चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता है. भले ही भाजपा इस बात को उठाती रहती है, लेकिन मायावती का प्रयास कुछ ऐसा ही है.

मऊ की चार विधानसभा सीटों पर सपा और बसपा के बीच बराबर की लड़ाई रही है. यहां की मऊ सीट पर क़ौमी एकता दल प्रमुख मुख्तार अंसारी विधायक हैं और इस बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी को ही बसपा के प्रत्याशी ने बहुत कड़ी टक्कर दी थी. उस साल बसपा के भीम राजभर ने मुख्तार के साथ कांटे के लड़ाई में लगभग 6 हजार वोटों से हार गए थे. इस साल क़ौमी एकता दल और बसपा एक साथ हैं. लेकिन वोट में दो दूनी चार का गणित नहीं बैठता है. सपा ने इस बार भी अल्ताफ़ अंसारी को टिकट दे दिया है. मुस्लिम वोटों की बात और है और मुस्लिमों में अंसारी वोटों की बात और. सपा चाहती है कि इस बार यहां पर अंसारी वोट मुख्तार और अल्ताफ के बीच बंट जाएं और थोड़ी कड़ी टक्कर देखने को मिले. लेकिन मुख्तार अंसारी की छवि क्षेत्र में दहशतगर्द की कम और एक मसीहा के रूप में ज्यादा है. सपा से हुआ हालिया टकराव भी उनको थोड़ी बढ़त दे देता है. लोग साफ़ कहते हैं कि मऊ के बाहर मुख़्तार भाई माफिया या डॉन होंगे, लेकिन कौम के लोगों के लिए वे किसी मसीहा से कम नहीं हैं.

मऊ के चिरैयाकोट में मुस्लिम इंटर कॉलेज है. यहां मिले 37 वर्षीय मसूद बताते हैं, ‘आप मुख्तार का प्रभाव यहां कम होने की बात कर रहे हैं, लेकिन सपा ने जो उनको बाहर किया है, उससे उनके प्रभाव का ग्राफ और भी ज्यादा चढ़ा है. लोग जान रहे हैं कि मुख्तार भाई अपनी पुरानी पार्टी में वापस चले गए हैं और वापिस पुराने रंग में वापिस मिलेंगे.’ साथ में ही मिले शमसुद्दीन अंसारी कहते हैं, ‘यहां मुस्लिम वोट बहुत ज्यादा है, लेकिन ये बात भी देखने की है कि वो जाता किधर है. अल्ताफ़ भाई पिछली बार भी खड़े थे, इस बार भी खड़े हैं. लेकिन मुस्लिम भाई मुख्तार को वोट करेंगे, उनको हिला पाना मुश्किल है.’ पास में ही ट्रॉली पर बैठे राजू कुमार चिल्लाकर एक ही बात बोलते हैं, ‘आप मुख्तार भाई के खिलाफ़ कुछ नहीं निकलवा पाएंगे. कोई नहीं बोलेगा. सब उनको मानता है, 2014 के बाद से तो और भी.’

दरअसल साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कौम के वोटों को एकीकृत करने के लिए मुख्तार अंसारी ने जो कदम उठाया था, वह इलाके के लोगों को बहुत बड़ा कदम लगता है. बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस के अजय राय खड़े हुए थे. अजय राय को वोटों के ध्रुवीकरण की लहर के बीच मुस्लिम वोटों की ज़रुरत थी, जो काफी पहले से अरविन्द केजरीवाल के पक्ष में थे. ऐसे में अजय राय के कट्टर दुश्मन रहे मुख्तार अंसारी ने जेल से बैठे-बैठे ऐलान कर दिया कि वे लोकसभा चुनाव बनारस से नहीं लड़ेंगे ताकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा न हो, और उन्होंने मुस्लिमों को अजय राय के पक्ष में जाने की नसीहत भी दे दी. अब इस कदम से भी अजय राय जीत तो नहीं पाए लेकिन उनकी बहुत बुरी हार एक थोड़ी बुरी हार में बदल गयी.

2014 की इस घटना का मऊ और गाजीपुर में सीधा असर देखने को मिलता है. आपराधिक छवि वाले मुख्तार अंसारी को एक मर्सिनरी के तौर पर देखा जाना यहां आम बात है. लेकिन सपा के पक्ष में जाते वोट भी इस ओर इशारा करते हैं कि मुख्तार के खिलाफ़ वोटों का एक बड़ा जत्था मौजूद है. 42 वर्षीय आबिद कहते हैं, ‘ये हम लोग भी मानते हैं कि मुख्तार भाई ने कौम के लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन मऊ को अब बाहर का रास्ता देखना है. उनकी छवि तो खराब है न, बस यही एक कारण है कि हम लोग उनके खिलाफ वोट करते हैं.’

मऊ की ही मधुबन सीट पर बाभन बनाम बाभन का समीकरण सर्वोपरि रहा है लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. 2012 में बसपा और सपा के बीच में महज़ 1300 वोटों के अंतर से हार-जीत का फैसला हुआ था. उस साल बसपा के उमेश पाण्डेय 51572 वोटों के साथ जीते थे, जबकि सपा के राजेन्द्र मिश्रा दूसरे स्थान पर रहे थे. ब्राह्मणबहुल मानी जाने वाली इस सीट पर इस बार का समीकरण दूसरा है. बसपा ने तो अपने उमेश पाण्डेय को बतौर प्रत्याशी बरकरार रखा है. लेकिन उन्हें कड़ी टक्कर देने वाले राजेन्द्र मिश्रा नहीं लड़ रहे हैं. सपा-कांग्रेस गठबंधन के मद्देनज़र ये सीट इस बार कांग्रेस के खाते में चली गयी है. कांग्रेस ने भी ब्राह्मण वोटों के लालच में अमरेश चंद पाण्डेय को टिकट दिया है. भाजपा ने मधुबन से इस बार दारा सिंह चौहान को खड़ा किया है. दारा सिंह चौहान घोसी सीट से सांसद भी रह चुके हैं, पहले बसपा में थे और साल 2015 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. मऊ के इलाके में दारा सिंह चौहान को अच्छीखासी पकड़ हासिल है, लेकिन वे इस इलाके के ब्राह्मण वोटों को साध पाने में कितना सफल होते हैं, यह अभी साफ़ नहीं है. ब्राह्मणों के बीच भाजपा की अच्छी पकड़ है, लेकिन कांग्रेस भी इस विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों को पकड़े रहने में कोई ढिलाई नहीं बरत रही है. चन्दन पट्टी के रहने वाले शिवनारायण तिवारी बताते हैं, ‘मधुबन में बहुत ज्यादा कन्फ्यूजन है कि वोट किधर दें. पिछली बार भी इसी कन्फ्यूजन में सपा और बसपा में क्लोज़ फाईट हुआ था, लेकिन कांग्रेस कैसी पार्टी है, सबे जानते हैं! इससे अच्छा कोई भाजपा या बसपा को न दे दे.

दारा सिंह चौहान भाजपा के ओबीसी चेहरे हैं, लेकिन उन्हें इस सीट पर ब्राह्मणों का समर्थन मिलता दिख रहा है. कारण सिर्फ एक है कि कांग्रेस. बसपा के उमेश पाण्डेय पर आरोप हैं कि उन्होंने अपने क्षेत्र में काम नहीं कराए हैं, ऐसे में उनके वोटों से हुई कटौती कांग्रेस की झोली में गिरना मुश्किल है, क्योंकि प्रदेश में कई जगहोंपर कांग्रेस का ग्राफ थोड़ा गिरा है. ऐसे में ये वोट भाजपा की ओर जा सकते हैं, ऐसा देखा जा रहा है.

गाजीपुर मऊ से थोड़ा ही दूर है. लेकिन ये न तो मुख्तार अंसारी के लिए दूर है, न उनके प्रभाव के लिए. इसलिए यहां की विधानसभा सीटों पर बसपा सफलता के लिए क़ौमी एकता दल पर निर्भर है. और फौरी तौर पर देखें तो बसपा को इसका लाभ मिलता दिख रहा है और इस चक्कर में सपा-कांग्रेस गठबंधन पीछे छूटता नज़र आ रहा है. कारण है यहां की मोहम्मदाबाद सीट पर सिबगतुल्लाह अंसारी का प्रत्याशी होना. मुख्तार अंसारी के भाई सिबगतुल्लाह अंसारी इस सीट पर अब क़ौमी एकता दल से नहीं जबकि बसपा से प्रत्याशी हैं, और चूंकि इस इलाके में भी उनके नाम पर नहीं बल्कि मुख्तार अंसारी के नाम पर वोट पड़ते हैं तो उन्हें भी क़ौमी एकता दल और बसपा के वोट मिलने के आसार हैं. यहां पर सपा-कांग्रेस का खेल इसलिए गड़बड़ा सकता है क्योंकि पिछली बार के रनर-अप और सपा प्रत्याशी राजेश राय नहीं लड़ रहे हैं और सीट गिरी है कांग्रेस की झोली में. कांग्रेस ने कुशवाहा और दलित वोटों को साधने की नीयत से जनक कुमार कुशवाहा को टिकट दिया है, जिनकी इलाके में कम पूछ है और लोग उन्हें कम जानते हैं.

मुख्तार अंसारी जिन कारणों से जेल के पीछे हैं, उसका प्रतिफल पिछले विधानसभा चुनावों से सफल नहीं हो पा रहा है. भाजपा के कृष्णानंद राय के चर्चित हत्याकांड में मुख्तार अंसारी का नाम सामने आया था, जिसके बाद से वे जेल में ही हैं. भाजपा की प्रत्याशी अलका राय दिवंगत कृष्णानंद राय की पत्नी हैं. सहानुभूति की लहर के साथ वो एक बार ये सीट निकाल चुकी हैं, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों से वे दूसरा स्थान भी हासिल कर पाने में असफल रही हैं. भाजपा ने इस बार फिर से उन पर अपना दांव लगाया है लेकिन उनकी जीत पर अभी भी संदेह बना हुआ है. इसका जवाब हमें इलाहाबाद में पत्रकार प्रमोद शुक्ला ने दिया था कि सहानुभूति की लहर में बार-बार जीत नहीं मिलती है. चुनाव एक या दो बार सहानुभूति पर जीता जा सकता है, लेकिन आगे के लिए रणनीतिक जिम्मेदारी उठानी होगी.

मोहम्मदाबाद में तीन समुदायों के वोट निर्णायक अवस्था में रहे हैं. भूमिहार, दलित और मुस्लिम. दलितों और मुस्लिमों का झुकाव जहां सिबगतुल्लाह अंसारी की ओर रहा है, वहीं भूमिहार अलका राय और बीते साल सपा के प्रत्याशी राजेश राय के बीच में घूमते रहे हैं. बीते विधानसभा चुनाव में सपा की लहर में सभी भूमिहार वोट सपा की ओर चले गए लेकिन वे इस बार फिर से अलका राय के पक्ष में जाने को लालायित दिख रहे हैं.

पवन कुमार राय बताते हैं कि भूमिहार लोग भूमिहार को वोट नहीं देते हैं, जबकि भूमिहारों के गौरव को वोट देते हैं. वो कहते हैं, ‘पिछली बार हमने राजेश राय को वोट दिया था, इसलिए कि मुसलमान पावर में न आ जाए. लेकिन बाहुत करीब से लड़ाई छूट गयी. अलका राय को नहीं दिए थे क्योंकि उन्होंने कुछ काम ही नहीं किया था. इस बार इतना बसपा-बसपा हो रहा है तो लग रहा है कि फिर से अलका राय को दिया जाए.’

मोहम्मदाबाद जैसी संवेदनशील सीट से आगे बढ़ें तो गाजीपुर सीट भी एक ऐसी सीट है जहां मुख्तार अंसारी फैक्टर के सामने भाजपा और सपा कांटा फंसाकर खड़ी हैं. बीते चुनाव में यहां महज़ 241 वोटों के अंतर हार-जीत का फैसला हुआ था. खांटी सपाई के तौर पर प्रचलित अच्युतानंद मिश्रा के बेटे विजय मिश्रा सपा के टिकट पर 241 वोट से जीत पाए थे. उनकी हारजीत का फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट में जाकर हुआ था. लेकिन पार्टी विजय मिश्रा के कामकाज से खुश नहीं थी तो उनका टिकट काट दिया गया. विजय मिश्रा बिफर पड़े और बसपा का हाथ थाम लिया. उनसे 2012 में हारे बसपा के राजकुमार गौतम ने इस परिस्थिति को और मजेदार बनाया और सपा में चले गए. यानी बीते चुनाव के सपाई-बसपाई ने अपने-अपने दलों की अदलाबदली कर डाली. हालांकि लड़ दोनों ही नहीं रहे हैं. इस इलाके में बसपा ने संतोष कुमार यादव को टिकट दिया है, तो सपा ने राजेश कुशवाहा को. रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने इस इलाके के टिकट बंटवारे में खूब दखल दी है तो उनकी करीबी मानी जा रही संगीता बलवंत को भाजपा ने टिकट दिया गया है. इस सीट पर मुख्तार भले ही किसी सत्ता के रूप में न स्थापित हों, लेकिन वे बसपा के वोटबैंक को ज़रूर प्रभावित कर सकते हैं.

गाजीपुर की इस सीट पर भले ही मुस्लिम वोट ज्यादा न हों, लेकिन मुख्तार अंसारी के बसपा में आने के बाद दलित और पिछड़ी जातियों के वोट भी बसपा के पास आ सकते हैं. इसकी हवा भी मजबूत है और इसकी संभावना भी. ऐसे में यह साफ़ है कि गाजीपुर की विधानसभा सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय है और इन सीटों पर फैसला भी बेहद कम अंतर से होना है.

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